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वंदे मातरम के 150 वर्ष: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया, जानिए राष्ट्रगीत का गौरवशाली इतिहास

07/11/2025  Anish Srivastava  33 views

भारत के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य स्मरणोत्सव समारोह का शुभारंभ किया।
यह आयोजन केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना, संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा का उत्सव है।

कार्यक्रम का आयोजन विज्ञान भवन, नई दिल्ली में किया गया, जहां देशभर से साहित्यकार, संगीतकार, स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के प्रतिनिधि और विद्यार्थियों ने भाग लिया।

मोदी का संबोधन: “वंदे मातरम केवल शब्द नहीं, यह भारत की आत्मा है”

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा,

“वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, यह भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है। यह गीत उस समय लिखा गया जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, लेकिन लोगों के दिलों में स्वतंत्रता की ज्वाला जल रही थी।”

उन्होंने कहा कि “बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब यह गीत लिखा, तो शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले वर्षों में यह गीत आज़ादी का नारा बन जाएगा।”


🕊️ कार्यक्रम की झलकियाँ

  • स्मरणोत्सव की शुरुआत सुरों की अर्पणा से हुई, जिसमें 150 से अधिक कलाकारों ने एक स्वर में “वंदे मातरम” गाया।

  • समारोह में स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किया गया।

  • प्रधानमंत्री ने “वंदे मातरम स्मारक डाक टिकट और स्मृति सिक्का” भी जारी किया।

  • आयोजन में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) और संस्कृति मंत्रालय ने संयुक्त रूप से भागीदारी की।


📖 ‘वंदे मातरम’ का इतिहास और महत्व

‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 ई. में की थी और इसे पहली बार उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया था।
यह गीत भारत की भूमि को माता के रूप में चित्रित करता है — जो हरे-भरे खेतों, नदियों और पर्वतों से परिपूर्ण है।

1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान, जब ब्रिटिश हुकूमत ने बंगाल को विभाजित किया, तब “वंदे मातरम” ही आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया।
महात्मा गांधी, अरविंदो घोष, रवींद्रनाथ टैगोर, बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने इसे भारत के जागरण का प्रतीक बताया।

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, संविधान सभा ने “वंदे मातरम” को राष्ट्रीय गीत (National Song) का दर्जा दिया, जबकि “जन गण मन” को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया गया।


🌸 वंदे मातरम का सांस्कृतिक प्रभाव

‘वंदे मातरम’ का प्रभाव केवल राजनीति या आंदोलन तक सीमित नहीं रहा।
इस गीत ने कला, संगीत और सिनेमा में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी।

  • 1952 की फिल्म आनंदमठ में लता मंगेशकर द्वारा गाए “वंदे मातरम” संस्करण ने नई पीढ़ी को प्रेरित किया।

  • 1997 में ए. आर. रहमान ने “Vande Mataram – Maa Tujhe Salaam” के आधुनिक संस्करण से इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दी।

आज भी यह गीत राष्ट्रप्रेम और एकता का प्रतीक माना जाता है, जो हर भारतीय के हृदय में गूंजता है।


🛕 प्रधानमंत्री का संदेश और भविष्य की योजना

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह अवसर केवल अतीत को याद करने का नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी है।

“वंदे मातरम हमें सिखाता है कि भारत माता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। हमें आने वाले 25 वर्षों में ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को इसी भावना से पूरा करना है।”

उन्होंने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे वर्षभर वंदे मातरम से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं और प्रदर्शनी आयोजित करें ताकि नई पीढ़ी इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझ सके।


🎇 देशभर में उत्सव का माहौल

देश के कई राज्यों — पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, और तमिलनाडु — में आज स्कूलों और विश्वविद्यालयों में विशेष कार्यक्रम हुए।
बच्चों ने “वंदे मातरम” के विभिन्न भाषाई संस्करणों में समूह-गान किया और इस गीत की ऐतिहासिक झांकी प्रस्तुत की।

सोशल मीडिया पर भी #VandeMataram150Years ट्रेंड कर रहा है।
लाखों लोगों ने इसे “भारत माता को नमन” के साथ साझा किया।


 निष्कर्ष

‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह भारत की आत्मा और संघर्ष की आवाज़ है।
इसकी 150वीं वर्षगांठ हमें यह याद दिलाती है कि आज़ादी केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में —

“जब तक भारत माता का एक भी पुत्र या पुत्री इस गीत को गाता रहेगा, तब तक भारत की आत्मा अमर रहेगी।”


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