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120 बहादुर समीक्षा: शौर्य, त्याग और अनसुने पराक्रम की गूंज, फरहान अख्तर ने दिल जीत लिया

21/11/2025  Satish Rajput  156 views

1962 के भारत–चीन युद्ध की रेजांग ला लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास में उस अध्याय की तरह दर्ज है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के केवल 120 सैनिकों ने 3000 से ज्यादा चीनी सैनिकों से बिना पीछे हटे मुकाबला किया था। उनकी वीरता, वफादारी और कर्तव्य के प्रति समर्पण ने पूरी दुनिया को भारत की सैन्य शक्ति का असली रूप दिखाया। इन्हीं वीर बलिदानियों को समर्पित है फरहान अख्तर की नई फिल्म—120 बहादुर।

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कहानी की शुरुआत – दर्द, धोखे और देशभक्ति की नींव

फिल्म का आरंभ अमिताभ बच्चन की भारी, भावुक और सशक्त आवाज से होता है। उनकी वॉयसओवर आपको तुरंत 1962 की उस परिस्थिति में ले जाती है जहां चीन और भारत की दोस्ती एक खतरनाक धोखे में बदलने वाली थी। 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' की हवा में छिपी दरारें अचानक युद्ध के तूफान में बदल जाती हैं, और उसी मोड़ से कहानी शुरू होती है।

फिल्म हमें सीधे चुसुल सेक्टर की ऊंचाइयों पर ले जाती है, जहां चार्ली कंपनी के जवान कठिन मौसम, सर्द हवाओं और सीमित संसाधनों के बीच अपनी चौकी पर तैनात हैं। इस कंपनी की कमान मेजर शैतान सिंह भाटी के हाथों में है, एक ऐसा नाम जिसे आने वाली पीढ़ियों ने शौर्य का पर्याय बना दिया।

लड़ाई की पृष्ठभूमि – तूफान से पहले की शांति

चार्ली कंपनी, जिसे आमतौर पर ‘अहीर कंपनी’ कहा जाता है, इलाके को अपनी हथेली की रेखाओं की तरह जानती है। चीनी सेना की गतिविधि बढ़ रही है, हालात तनावपूर्ण हैं, लेकिन सैनिकों का मनोबल अटूट है। फिल्म इन शुरुआती दृश्यों में सैनिकों की साधारण जिंदगी, उनके रिश्ते, उनकी उम्मीदें और देश के प्रति प्रेम को खूबसूरती से दिखाती है।

धीरे-धीरे माहौल उस मोड़ पर आता है जहां युद्ध अवश्यंभावी लगता है।

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★ युद्ध के दृश्य – रोमांच, डर और साहस का अनोखा मिश्रण

जब चीनी सेना अचानक और भारी संख्या में हमला करती है, तो पूरा सेक्टर दहशत, धूल और गोलियों की आवाज से भर उठता है। इसी जगह फिल्म अपनी सबसे मजबूत पकड़ बनाती है।

120 भारतीय सैनिक, लगभग 30 गुना बड़ी सेना से लड़ रहे हैं—यह तथ्य ही रीढ़ में सिहरन भर देता है।

फिल्म दिखाती है कि कैसे इन जवानों ने— बेहतर इलाके की समझ, ऊंचाई की पोजिशन, अनुशासन और अदम्य साहस के दम पर आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी।

वेव दर वेव चीनी सैनिक आगे बढ़ते रहते हैं, लेकिन अहीर कंपनी डटी रहती है। इस सेक्शन में निर्देशक ने युद्ध की अव्यवस्था, सैनिकों की धड़कनें, भय, उन्माद और आत्मविश्वास—सब कुछ वास्तविकता के करीब दिखाया है।

★ अभिनय – फरहान अख्तर ने कमांडर की आत्मा पकड़ ली

फरहान अख्तर एक अभिनेता के रूप में हमेशा प्रयोग करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने खुद को एक नए रूप में पेश किया है।

मेजर शैतान सिंह की भूमिका में वे— शांत, संयमित, दृढ़ और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली नज़र आते हैं। उनकी आंखों में जिम्मेदारी का बोझ भी दिखता है और अपने जवानों को हर कीमत पर बचाने की इच्छा भी।

स्पर्श वालिया (सिपाही रामचंद्र यादव) पूरी फिल्म का दिल हैं। कहानी उनकी नजरों से आगे बढ़ती है, और यही वजह है कि उनका प्रदर्शन दर्शकों को भीतर तक छू जाता है।

राशि खन्ना अपने छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण किरदार में गर्मजोशी लाती हैं।

सपोर्टिंग कास्ट का काम भी विश्वसनीय है—हर चेहरा युद्ध की थकान और आंतरिक संघर्ष को दिखाता है।

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★ डायरेक्शन और तकनीकी पक्ष – साफ, प्रामाणिक और ईमानदार

रजनीश ‘रैजी’ घई का निर्देशन कई जगहों पर चमकता है। उन्होंने इस कहानी को बिना ज्यादा नाटकीयता के एक ईमानदार अंदाज में बताया है।

लोकेशन और सेट डिजाइन वास्तविक लगते हैं।

सिनेमैटोग्राफी युद्ध की अराजकता और सैनिकों की धड़कनों को पकड़ लेती है।

कुछ जगह फिल्म थोड़ी धीमी जरूर लगती है, लेकिन कहानी की गरिमा और भावनात्मक वजन इसे संभाल लेता है।

★ म्यूजिक – युद्ध का रोमांच और भावनाएँ दोनों साथ

बैकग्राउंड स्कोर बेहतरीन है। कई दृश्य सिर्फ संगीत की वजह से और भी शक्तिशाली बन जाते हैं।

गाने औसत हैं, लेकिन फिल्म की भावनाओं के साथ मेल खाते हैं।

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★ फाइनल वर्डिक्ट – देखें या नहीं?

120 बहादुर एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ कहानी नहीं सुनाती, बल्कि इतिहास की धड़कन को महसूस कराती है।

यह फिल्म— सैनिकों के त्याग उनकी वीरता और उनके अटूट हौसले को सलाम करती है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐½☆ (3.5/5 स्टार)

देखने लायक, प्रेरक और दिल को छू जाने वाली फिल्म।


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