Adda Junction - Latest News, Blogs & Stories from India and Beyond | अड्डा जंक्शन – देश-दुनिया की ताज़ा खबरें और ब्लॉग्स

Header

नई दिल्ली 🏛️

Loading...

लखनऊ 🕌

Loading...

पटना 🏯

Loading...

collapse
...
Home / Editor’s Choice / पूर्व उप मुख्यमंत्री रेणु देवी की सीट पर मिल रही है निर्दलीय प्रत्याशी से कड़ी टक्कर

पूर्व उप मुख्यमंत्री रेणु देवी की सीट पर मिल रही है निर्दलीय प्रत्याशी से कड़ी टक्कर

05/11/2025  Ravishankar Kumar  274 views

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है। हर सीट पर सियासी हलचल तेज है, लेकिन पश्चिम चंपारण की बेतिया विधानसभा सीट, जो अब तक भाजपा का मजबूत गढ़ रही है, इस बार खास चर्चा में है। कारण है — पूर्व उप मुख्यमंत्री रेणु देवी की सीट पर मिल रही निर्दलीय प्रत्याशी रोहित शिकारिया से कड़ी चुनौती।

🔹 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भाजपा का गढ़ अब डगमगाता नजर आ रहा है

बेतिया सीट पर पिछले 25 वर्षों से भाजपा का दबदबा रहा है। सिर्फ 2015 में कांग्रेस के मदनमोहन तिवारी ने इस गढ़ में सेंध लगाई थी। उसके बाद से रेणु देवी लगातार रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज करती रहीं। लेकिन 2025 के इस चुनाव में स्थिति बिल्कुल अलग है — जनता असमंजस में है और नाराज भी।

🔹 नया समीकरण: तीन तरफा मुकाबला

3_20251104_234242_0000
 

इस बार मुकाबला त्रिकोणीय बन गया है —

1. रेणु देवी (भाजपा – NDA)

2. रोहित शिकारिया (निर्दलीय)

3. वसी अहमद (कांग्रेस – महागठबंधन)

ये भी पढ़ें- नरकटियागंज विधानसभा में वोटर असमंजस में फिर भी भाजपा को बढ़त।

रोहित शिकारिया की बढ़ती लोकप्रियता:

रोहित शिकारिया, जो बेतिया नगर निगम की महापौर गरिमा शिकारिया के पति हैं, इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरकर बड़ा असर डाल रहे हैं। गरिमा शिकारिया पिछले 5 वर्षों से स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं। उन्होंने जनता से जुड़े कई मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाई —

सबसे बड़ा मामला तब सामने आया जब उन्होंने आरोप लगाया कि बेतिया के सांसद अपने सरकारी पद का दुरुपयोग कर नगर निगम का पैसा फर्जी बिल के ज़रिए पेट्रोल चोरी में खर्च कर रहे हैं।

इस सनसनीखेज खुलासे को जनसुराज के नेता प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक किया, जिससे मामला पूरे बिहार की राजनीति में गरमा गया।

इस घटनाक्रम के बाद से गरिमा शिकारिया जनता के बीच एक ईमानदार और साहसी नेता के रूप में उभरीं, जिसका सीधा फायदा उनके पति रोहित शिकारिया को मिल रहा है। स्थानीय लोगों में यह भावना है कि “जो बोलने की हिम्मत रखता है, वही जनता का सच्चा प्रतिनिधि हो सकता है।”

🔹 रेणु देवी की मुश्किलें बढ़ीं

5_20251104_234243_0001
 

ये भी पढ़ें- बिहार चुनाव 2025: खेसारी लाल बनाम पवन सिंह—बयानबाज़ी गरमाई, ‘नचनिया’ टिप्पणी पर ज्योति का कड़ा विरोध

भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री रेणु देवी इस बार कई मोर्चों पर घिरी हुई हैं। जनता में उनके खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी की लहर साफ दिख रही है। इसके साथ ही उनके परिवार से जुड़ा विवाद भी उनकी छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।

कहा जाता है कि रेणु देवी के भाई, पीनू उर्फ पिंटू, स्थानीय स्तर पर एक विवादास्पद व्यक्ति हैं जिन पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और वे फिलहाल जेल में हैं। पिंटू का नाम जमीन कारोबार और दबंगई से जुड़ा बताया जाता है, जिसके कारण रेणु देवी की छवि पर नकारात्मक असर पड़ा है।

भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ता भी अब खुले तौर पर असंतुष्ट दिख रहे हैं, जो इस बार उनके लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।

14_20251104_234344_0000
 

🔹 कांग्रेस का समीकरण: वसी अहमद का कार्ड

महागठबंधन ने इस सीट से कांग्रेस के वसी अहमद को मैदान में उतारा है। वसी अहमद एक सधे हुए स्थानीय नेता हैं जिनकी पकड़ मुस्लिम और दलित वोटरों में अच्छी मानी जाती है। अगर वे अपने कोर वोट बैंक को एकजुट रखने में सफल रहे, तो मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा।

🔹 पिछले चुनावों का वोट शेयर और मतदान प्रतिशत

वर्ष प्रत्याशी पार्टी वोट शेयर (%) स्थिति

2020 रेणु देवी भाजपा 58.3% विजेता

2015 मदनमोहन तिवारी कांग्रेस 51.2% विजेता

2010 रेणु देवी भाजपा 61.4% विजेता

2005 रेणु देवी भाजपा 56.7% विजेता

टर्नआउट (मतदान प्रतिशत):

2020 – 57.4%

2015 – 60.2%

2010 – 55.6%

इस बार उम्मीद है कि बेतिया में मतदान प्रतिशत 62% से अधिक रहेगा, क्योंकि मुकाबला बेहद रोचक और करीबी होता जा रहा है।

6_20251104_234344_0001
 

🔹 निष्कर्ष: भाजपा के गढ़ में हिलती नींव

कुल मिलाकर देखा जाए तो बेतिया की यह लड़ाई अब “सुरक्षित सीट” नहीं रह गई है। रेणु देवी के सामने जनता की नाराजगी, भाई से जुड़ी छवि की समस्या और निर्दलीय रोहित शिकारिया की बढ़ती लोकप्रियता, तीनों मिलकर इस सीट को सस्पेंस भरी बना रहे हैं।

भाजपा अगर समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं करती, स्थानीय नेताओं को सक्रिय नहीं करती और जनता से जुड़ाव नहीं बढ़ाती, तो इस बार बेतिया की सीट उसके हाथ से निकल सकती है।

महागठबंधन और निर्दलीय दोनों के बीच वोटों का विभाजन भाजपा के लिए राहत बन सकता है, लेकिन अगर निर्दलीय उम्मीदवार को जनसमर्थन बढ़ता गया, तो भाजपा को अपने ही गढ़ में हार का सामना करना पड़ सकता है।


Share:

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy