Adda Junction - Latest News, Blogs & Stories from India and Beyond | अड्डा जंक्शन – देश-दुनिया की ताज़ा खबरें और ब्लॉग्स

Header

नई दिल्ली 🏛️

Loading...

लखनऊ 🕌

Loading...

पटना 🏯

Loading...

collapse
...
Home / Editor’s Choice / धर्मेंद्र की पूरी जीवन कहानी: बचपन से सुपरस्टार बनने तक | प्यार, परिवार, फ़िल्में और विरासत

धर्मेंद्र की पूरी जीवन कहानी: बचपन से सुपरस्टार बनने तक | प्यार, परिवार, फ़िल्में और विरासत

24/11/2025  Admin  209 views

धरम सिंह देओल उर्फ धर्मेंद्र (8 दिसंबर 1935 – 24 नवंबर 2025) का जीवन एक यादगार फ़िल्मी कहानी है। पंजाब के लुधियाना ज़िले के नसरली गाँव में जन्मे धर्मेंद्र एक जाट सिख परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता केवल कृष्ण सिंह देओल स्कूल के हेडमास्टर थे और माता सतवंत कौर थीं। उन्होंने ललटन कलां के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल से शिक्षा ली और फ़गवाड़ा के रामगढ़िया कॉलेज में इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी न होने के बावजूद उनका दिल बड़ी दुनिया में जाने की आग में जलता रहा। बचपन में उन्होंने दिलीप कुमार की फ़िल्में देखीं और बड़े परदे के सपने देखने लगे। 1958 में धर्मेंद्र फ़िल्मफ़ेयर के टैलेंट हंट में भी सफलता पाकर हौसला बढ़ाया, लेकिन पहली असली पारी 1960 में अजय हिंगोरानी की दिल भी तेरा हम भी तेरे से आई। उस फ़िल्म से इन्हें हीरो के रूप में केवल ₹51 की फी मिल सकी – यह शायद बताने के लिए काफी था कि बचपन का खेल अब कड़ी मेहनत का ज़माना बन चुका है।

मुंबई के सपनों में डूबकर धर्मेंद्र ने संघर्ष किए: 

वह कई किलोमीटर पैदल चलकर प्रोड्यूसरों तक पहुंचते और कई दिन चना खाकर गुज़ारा करते थे। लेकिन इन कोशिशों का फल भी आया। 1961 में धर्मेंद्र की शोला और शबनम से पहली कामयाबी मिली। फिर 1963 की बंदिनी ने उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार दिलाया, और 1966 में आई फूल और पत्थर ने साबित किया कि यह लुधियानावाला लड़का कच्चा नहीं था। फ़िल्म में उन्होंने पहली बार शर्टलेस होकर दर्शकों को चौंका दिया, और यह दृश्य उनके “ही-मैं” ख़िताब को अमर कर गया। फूल और पत्थर की धमाकेदार सफलता ने उन्हें फ़िल्म फ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए पहली बार नामांकित भी किया।

1970 के दशक में धर्मेंद्र बोलते लहज़े और दमदार बॉडी लैंग्वेज के साथ परदे पर राज करने लगे। उन्होंने रोमांटिक हीरो से एक्शन स्टार का रोल बड़े सहजता से निभाया। 1973-74 में उन्होंने यादों की बारात और गदर के दिन जैसी फिल्मों से यादगार फ़ीसद हासिल किया। लेकिन सबसे बड़ी झल्लाहट 1975 में शोले की आई, जिसमें धर्मेंद्र ने वीरू की भूमिका निभाकर इतिहास रच दिया। शुरू में धीमी ओपनिंग के बाद यह फ़िल्म अचानक “रातोंरात सेंसेशन” बन गई। इसने 15–18 करोड़ जनता को थियेटर तक खींचा और 1975 की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। वीरू के किरदार में धर्मेंद्र की यारी और हँसमुखी ने दोस्ती का नया गीत गा दिया – शहरी हो या देहात, हर फ़िल्मप्रेमी ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गुनगुनाने लगा।

उसी समय धर्मेंद्र ने कॉमेडी और इमोशनल रोल भी नहीं छोड़े। जी. मुकुट द्वारा निर्देशित गुड्डी, चुपके चुपके जैसी फिल्मों में उनकी मासूमियत ने दिलों को चुरा लिया। युद्धप्रमुख एक्टर से कहीं अधिक, उन्होंने हर चेहरे के भाव समझे, हर रंग में ढल सके। फिर 1980-90 के दशक में उम्र बढ़ने पर भी धर्मेंद्र ने पीछे नहीं हटने का फ़ैसला किया। वह पिता के रूप में, अनुभवी किरदारों में अपना, लाइफ इन अ मेट्रो, यमला पागल जैसी फ़िल्मों में भी जमकर चमके। आज भी धुरंधर दर्शक उनकी हर नई प्रदर्शनी को तालियों से नवाज़ते थे।

व्यक्तिगत जीवन: 

धर्मेंद्र ने मात्र 19 साल की उम्र में 1954 में प्रकाश कौर से विवाह किया। यह शादी होने के तीन दशक बाद धर्मेंद्र को सुपरस्टार बनाया। प्रकाश कौर से उनका सुखी वैवाहिक जीवन रहा और चार संतानें हुईं – दो बेटे सुनील देव और बॉबी देव (दोनों बाद में फ़िल्म अभिनेता बने), तथा दो बेटियाँ विजेता और अजीता। सुनील देव ने घायल जैसे एक्शन हीरो के रोल से नाम कमाया, जबकि बॉबी ने कभी खुशी… कभी ग़म और अंदाज़ अपना अपना जैसी फिल्मों से पहचान बनाई। अपने दोनों बेटों की फ़िल्में लॉन्च करने के लिए धर्मेंद्र ने 1983 में विजयता फ़िल्म्स कंपनी बनाकर सुनील को बेताब (1983) और बॉबी को बरसात (1995) जैसी फिल्मों में मौका दिया। इस तरह उन्होंने अपने अपने परिवार को भी बॉलीवुड से जोड़कर रखा।

1980 में धर्मेंद्र ने बॉलीवुड की मशहूर “ड्रीम गर्ल” हेमा मालिनी से भी विवाह कर लिया, तब तक वे पहले ही विवाहित थे। यह जोड़ी फ़िल्म पर्दे की तरह ही लोगों के दिलों में भी आग लगा गई। हालांकि विवाह के समय धर्मेंद्र हिंदू ही रहे, अटकलें रहीं कि उन्होंने धर्म परिवर्तन किया है – धर्मेंद्र ने ख़ुद यह अफवाहें ख़ारिज करते हुए कहा कि उन्होंने कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया। धर्मेंद्र और हेमा मालिनी को दो बेटियाँ हुईं – ईशा (1981) और अहाना (1985)। दोनों परिवारों के बीच रिश्ते अच्छे रहे; धर्मेंद्र अक्सर अपने पहले परिवार के साथ ही रहे और अहम मौकों पर सभी जमा होते रहे।

राजनीतिक करियर और सार्वजनिक सेवा: 

धर्मेंद्र ने मात्र अभिनय तक सीमित न रहकर देश सेवा की बारी सोची। 2004 में उन्होंने भारत जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ली और राजस्थान के बीकानेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए। इस दौरान उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा कि उन्हें “डिक्टेटर पेरपेच्वो” के रूप में चुन लो ताकि लोकतंत्र के बुनियादी शिष्टाचार सिखाए जा सकें – मज़ाकिया बात निकली तो आलोचना भी झेलनी पड़ी। सांसद के रूप में धर्मेंद्र का कई बार सदन में कम जाना-जाना सवालों के घेरे में रहा, लेकिन उन्होंने कला और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को बराबर तवज्जो दी। राजनीति में एक कार्यकाल पूरा करने के बाद 2009 में उन्होंने फिर चुनाव नहीं लड़ा।

 कला और मनोरंजन के क्षेत्र में धर्मेंद्र की कड़ी मेहनत को कई बड़े सम्मान मिले। 1997 में फ़िल्मफ़ेयर ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाज़ा, जो उनकी लगन और योगदान की पहचान थी। सिनेमा के प्रति सूझ-समझ और समर्पण के लिए 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। जीवन में मिले इन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से उनके दिल को सुकून मिला – जैसे सरकार ने उनकी कला को ही इतिहास की उंगली से सलाम किया हो।

धरमेंद्र की जनता में लगन और सादगी के लिए भी तारीफ हुई। कई पश्चिमी मैगज़ीनों ने उन्हें विश्व के सबसे हैंडसम अभिनेताओं में गिना। दिलीप कुमार ने उन्हें ग्रीक देवता कहते हुए चुटकी ली कि “भगवान से मिलने पर बस इतनी शिकायत होगी – आपने मुझे धर्मेंद्र जितना खूबसूरत क्यों नहीं बनाया?”। सलमान खान ने स्वीकार किया कि वे धर्मेंद्र का दीवाना हैं और उन्हें “सबसे खूबसूरत इंसान” कहते थे। जया बच्चन ने माना कि उन्होंने धर्मेंद्र को पहली मुलाक़ात पर ही गोद में छुपा लिया था। ज़ीनत अमान और माधुरी दीक्षित जैसी अभिनेत्रियाँ भी उनकी फ़िल्मी जादू और दिलकश अदाओं की कायल रहीं।

विरासत: 

धर्मेंद्र ने 1970 और 1980 के दशक में 7-7 सफल फ़िल्में देने का अनोखा रिकॉर्ड बनाया – यह उपलब्धि आज तक किसी ने नहीं दोहराई। 2005 में फ़िल्मफेयर के 50वें जयंती समारोह में शोले को “दस बरस की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म” का ख़िताब मिला, जिसमें धर्मेंद्र की अहम भूमिका थी। उन्हें समाज में हीरोज की श्रेणी में रखा गया और समय-समय पर ‘बॉलीवुड लेजेंड्स’ की सूची में भी शामिल किया गया।

धर्मेंद्र के जाने से भारतीय सिनेमा का एक युग समाप्त हुआ, लेकिन उनकी यादें आज भी लाखों दिलों में जिंदा हैं। उनका ‘ही-मैं’ वाला मस्कुलर इमेज, सच्चे दिल वाले हीरो का व्यक्तित्व और घर-वाली के प्रति प्यार हर किसी के जहन में रवानी रखता है। पंजाब के सरल छोरे ने अपने जीवन का हर धर्म निभाया: उन्होंने प्यार और परिवार का धर्म, सिनेमा का धर्म और देश-दुनिया का धर्म खूबसूरती से पूरा किया। उनकी यह कहानी बताती है कि कैसे छोटे से गाँव का लड़का अपने हुनर, ईमानदारी और कड़ी मेहनत से दिलवाला धरम पाजी बन गया।


Share:

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy